शास्त्र ज्ञान · लेख

धर्म, कर्म और तंत्र

सत्कर्म, विकर्म और अकर्म — साधना की शक्ति का सही उपयोग

साधना से शक्ति आती है — और हर शक्ति के साथ उत्तरदायित्व भी। यह लेख गीता के कर्म-सिद्धांत के प्रकाश में समझाता है कि तंत्र-साधना कब धर्म बनती है और कब अधर्म, और क्यों साधक को अपनी साधना धर्म-स्थापना, लोक-कल्याण और राष्ट्र-कल्याण के सत्कर्म में लगानी चाहिए।

कुरुक्षेत्र में रथ पर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए
कुरुक्षेत्र में गीता-उपदेश — कर्म का रहस्य (कलात्मक चित्रण)

भूमिका

शक्ति के साथ उत्तरदायित्व

तंत्र को लेकर समाज में जो भय और भ्रांतियाँ हैं, उनका एक बड़ा कारण यह है कि कुछ लोगों ने साधना की शक्ति का उपयोग गलत उद्देश्यों के लिए किया — किसी को हानि पहुँचाने, डराने या धन कमाने के लिए। पर दोष शक्ति का नहीं, उसके उपयोग का है। अग्नि भोजन भी पकाती है और घर भी जला सकती है।

भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को यही सिखाया — कर्म से भागना नहीं, कर्म को सही ढंग से करना। गीता का कर्म-सिद्धांत ही वह कसौटी है जो बताती है कि साधक की साधना धर्म है या अधर्म, बाँधती है या मुक्त करती है।

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।— मनुस्मृति ८.१५अर्थ — नष्ट किया गया धर्म नष्ट करने वाले का नाश करता है, और रक्षा किया गया धर्म रक्षा करने वाले की रक्षा करता है।

अध्याय १

धर्म क्या है — धारण, अभ्युदय और निःश्रेयस

"धर्म" का अर्थ केवल पूजा-पद्धति या संप्रदाय नहीं है। धर्म शब्द "धृ" धातु से बना है — जिसका अर्थ है धारण करना। महाभारत की परिभाषा है:

धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः ।
यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः ॥— महाभारत, कर्ण पर्वअर्थ — धारण करने के कारण इसे धर्म कहते हैं; धर्म ही प्रजा को धारण करता है। जो धारण करने के गुण से युक्त है, निश्चय ही वही धर्म है।

अर्थात् जो व्यक्ति, परिवार, समाज और सृष्टि को जोड़कर, संभालकर रखे — वह धर्म है; और जो तोड़े, शोषण करे, किसी को हानि पहुँचाए — वह अधर्म है।

महर्षि कणाद ने धर्म की एक और सुंदर परिभाषा दी है, जो तंत्र से सीधे जुड़ती है:

यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ।— वैशेषिक सूत्र १.१.२अर्थ — जिससे अभ्युदय (सांसारिक उन्नति) और निःश्रेयस (परम कल्याण, मोक्ष) — दोनों की सिद्धि हो, वही धर्म है।

तंत्र स्वयं धर्म है: आगम-शास्त्र कहते हैं कि शुद्ध तंत्र-साधना भुक्ति और मुक्ति — दोनों देती है। यही तो धर्म की परिभाषा है — अभ्युदय और निःश्रेयस। इसलिए सात्त्विक, लोक-कल्याणकारी तंत्र-साधना अपने स्वरूप में ही धर्म है; अधर्म तब होता है जब उसका उपयोग धर्म के विपरीत किया जाए।

अध्याय २

कर्म के तीन भाव — सत्कर्म, विकर्म और अकर्म

गीता के चौथे अध्याय में भगवान कहते हैं कि कर्म की गति बहुत गहन है, और उसे समझने के लिए तीन बातों को जानना आवश्यक है:

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥— श्रीमद्भगवद्गीता ४.१७अर्थ — कर्म का स्वरूप जानना चाहिए, विकर्म का स्वरूप जानना चाहिए, और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति गहन है।

सत्कर्म (कर्म)
शास्त्र-विहित कर्तव्य
अर्थ: वह कर्म जो शास्त्र-सम्मत है और कर्तव्य रूप में किया जाता है — स्वधर्म का पालन।
उदाहरण: परिवार का पालन, ईमानदार आजीविका, सेवा, नित्य पूजा और जप।
फल: पुण्य और उन्नति — पर यदि फल की आसक्ति हो, तो वह भी बंधन बनता है।
विकर्म
निषिद्ध कर्म
अर्थ: वह कर्म जो शास्त्र द्वारा वर्जित है — जिससे स्वयं का या दूसरों का अहित हो।
उदाहरण: हिंसा, छल, शोषण, दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए किया गया कोई भी प्रयास।
फल: पाप और दुःख — कर्म का नियम अटल है, विकर्म लौटकर कर्ता तक आता है।
अकर्म
कर्म में कर्तापन का अभाव
अर्थ: निष्क्रियता नहीं — कर्म करते हुए भी "मैं कर्ता हूँ" का भाव न होना; फल का पूर्ण समर्पण।
उदाहरण: निष्काम सेवा, फल माँ को अर्पित करके की गई साधना।
फल: बंधन से मुक्ति — यह कर्म बाँधता नहीं, मुक्त करता है।

"विकर्म" की दो व्याख्याएँ

आदि शंकराचार्य सहित पारंपरिक भाष्यकार विकर्म का अर्थ निषिद्ध कर्म करते हैं — जैसा ऊपर बताया गया। पर आचार्य विनोबा भावे ने "गीता-प्रवचन" में एक और सुंदर दृष्टि दी: विकर्म यानी "विशेष कर्म" — बाहरी कर्म के साथ जुड़ा हुआ भीतर का मानसिक कर्म, अर्थात् मन की शुद्धि और भाव की साधना। उनके अनुसार जब बाहरी कर्म में यह आंतरिक विकर्म जुड़ता है, तब कर्म "अकर्म" बन जाता है — जैसे दीपक में तेल और बाती के साथ ज्योति जुड़े, तभी प्रकाश होता है।

साधक के लिए दोनों व्याख्याएँ उपयोगी हैं: पहली सावधान करती है कि क्या नहीं करना है, और दूसरी सिखाती है कि साधना कर्म को कैसे पवित्र बनाती है।

और अकर्म का रहस्य भगवान अगले ही श्लोक में खोलते हैं:

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥— श्रीमद्भगवद्गीता ४.१८अर्थ — जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है, वही योगी है और सब कर्म करने वाला है।

अध्याय ३

तंत्र-साधना में तीनों भाव

अब इन तीनों भावों को तंत्र-साधना पर लागू करें। एक ही मंत्र, एक ही साधना — उद्देश्य और भाव के अनुसार सत्कर्म भी बन सकती है, विकर्म भी, और अकर्म भी:

कर्म का भावतंत्र-साधना में स्वरूपपरिणाम
सत्कर्मगुरु-दीक्षा लेकर नित्य पूजा और जप; परिवार की रक्षा, स्वास्थ्य और शांति के लिए सात्त्विक अनुष्ठान; अन्नदान, सेवा, गुरु-सेवापुण्य, उन्नति, परिवार में सुख-शांति — अभ्युदय
विकर्म (निषिद्ध)किसी को हानि पहुँचाने, वश में करने या डराने के लिए प्रयोग; साधना के नाम पर धन या भय का व्यापार; सिद्धि का अहंकारपूर्ण प्रदर्शनपाप, दुःख, साधना का पतन — कर्म लौटकर कर्ता तक आता है
विकर्म (विशेष — विनोबा)बाहरी पूजा के साथ भीतर का भाव — ध्यान, समर्पण, मन की शुद्धि; मंत्र को यांत्रिक नहीं, भावपूर्ण बनानाकर्म पवित्र होकर अकर्म की ओर बढ़ता है
अकर्मनिष्काम साधना — जप का फल माँ को अर्पित; "करने वाले शिव हैं, मैं निमित्त हूँ" का भाव; साक्षी-भावबंधन से मुक्ति, चित्त-शुद्धि, आत्म-बोध — निःश्रेयस

ध्यान दें — साधना वही है, भाव बदलते ही उसका फल बदल जाता है। इसीलिए गुरु मंत्र से पहले साधक का भाव और संकल्प शुद्ध करते हैं।

अध्याय ४

विकर्म से सावधान — तंत्र का दुरुपयोग अधर्म क्यों है

तंत्र-ग्रंथों में अनेक प्रकार के प्रयोगों का वर्णन है। पर सात्त्विक गुरु-परंपराएँ स्पष्ट मानती हैं कि जो प्रयोग किसी दूसरे के अहित के लिए हो, वह विकर्म है — चाहे शास्त्र में उसका वर्णन क्यों न हो। वर्णन होना और करने योग्य होना — दो अलग बातें हैं।

तंत्र में विकर्म के रूप:

  • किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाने, बीमार करने या उसका अहित करने का प्रयोग
  • किसी की इच्छा के विरुद्ध उसे वश में करने का प्रयास — यह उसकी स्वतंत्र इच्छा का हनन है
  • भय दिखाकर, "किया-कराया" या "ऊपरी बाधा" का डर पैदा करके धन लेना
  • दीक्षा या साधना को व्यापार बनाना
  • सिद्धि या शक्ति का अहंकारपूर्ण प्रदर्शन
  • किसी व्यक्ति, समुदाय या आस्था के विरुद्ध साधना का प्रयोग

विकर्म क्यों लौटता है: कर्म का नियम अटल है — "अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्", किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म अवश्य भोगना पड़ता है। जो शक्ति दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए उठाई जाती है, वह अंततः साधक की अपनी साधना, स्वास्थ्य और शांति को नष्ट करती है। इसीलिए सच्चा गुरु शिष्य को ऐसे प्रयोग कभी नहीं सिखाता।

यहाँ का स्पष्ट नियम: किसी को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से की जाने वाली कोई भी साधना यहाँ पूर्णतः वर्जित है। साधना में शक्ति केवल शांति, रक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और आत्म-कल्याण के लिए है। (देखें — दीक्षा एवं साधना के नियम)

अध्याय ५

अकर्म — निष्काम साधना ही बंधन-मुक्त करती है

सत्कर्म अच्छा है, पर उसमें भी एक सूक्ष्म बंधन रहता है — फल की आसक्ति और "मैंने किया" का अहंकार। साधना की सर्वोच्च अवस्था है अकर्म — जहाँ साधक कर्म तो पूरी निष्ठा से करता है, पर कर्तापन और फल-आसक्ति छोड़ देता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥— श्रीमद्भगवद्गीता २.४७अर्थ — तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर कभी नहीं। तुम फल के हेतु मत बनो, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

तंत्र में अकर्म का स्वरूप:

  • "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्" — साधक स्वयं को शिव का अंश मानकर पूजा करता है; करने वाले शिव हैं, मैं केवल निमित्त हूँ।
  • जप-समर्पण — जप के अंत में उसका फल गुरु और इष्ट को अर्पित कर देना; "मेरा" कुछ नहीं रखना।
  • साक्षी-भाव — साधना में आने वाले अनुभवों को भी केवल देखना, उनसे चिपकना नहीं।
  • लोक-संग्रह — जो कुछ मिले, उसे दूसरों के कल्याण में लगा देना।

यही निष्काम साधना है — जो बाँधती नहीं, मुक्त करती है। और आश्चर्य यह है कि जो साधक फल माँगना छोड़ देता है, उसके जीवन का योग-क्षेम माँ स्वयं वहन करती हैं। (देखें — माँ भगवती — साधक की सहचरी)

अध्याय ६

शक्ति का उत्तरदायित्व — स्वयं से राष्ट्र और विश्व तक

साधना से साधक के भीतर एक शक्ति जागती है — एकाग्रता, आत्म-बल, निर्भयता, और लोगों के मन पर प्रभाव। यह शक्ति एक धरोहर है, निजी संपत्ति नहीं। गीता कहती है कि श्रेष्ठ व्यक्ति का आचरण ही दूसरों के लिए मार्ग बनता है:

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥— श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१अर्थ — श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं; वह जो प्रमाण स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।

साधक का उत्तरदायित्व भीतर से बाहर की ओर फैलता है — जैसे जल में फेंके कंकड़ से वृत्त फैलते हैं:

स्वयंपरिवारसमाजराष्ट्रविश्व
१. स्वयं
भीतर के पाश — भय, लोभ, क्रोध, अहंकार — जीतना; अपने स्वधर्म का पालन। पहला धर्मयुद्ध भीतर का है।
२. परिवार
घर में सात्त्विक वातावरण, बच्चों को संस्कार, बुज़ुर्गों की सेवा, आपसी प्रेम और धैर्य।
३. समाज
अन्नदान, सेवा, अंधविश्वास और भय का निवारण, दुखी और भयभीत लोगों को सहारा, व्यसन से मुक्ति में सहायता।
४. राष्ट्र
अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी और कर्तव्य-निष्ठा, देश के प्रत्येक नागरिक के कल्याण का संकल्प — चाहे वह किसी भी आस्था का हो।
५. विश्व
"सर्वे भवन्तु सुखिनः" — समस्त प्राणियों और प्रकृति के कल्याण की भावना।
साधना से प्राप्त शक्ति का उत्तरदायित्व — भीतर से बाहर की ओर फैलते वृत्त

धर्म-स्थापना का सच्चा अर्थ

भगवान ने अपने अवतार का उद्देश्य बताया:

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥— श्रीमद्भगवद्गीता ४.८अर्थ — सज्जनों की रक्षा, दुष्कर्मों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

साधक के लिए "धर्म-स्थापना" का अर्थ है — अपने आचरण, सेवा और सत्य से समाज में धर्म को जीवित करना। "दुष्कृत" का विनाश यानी बुराई का विनाश — अंधविश्वास, शोषण, भय, नशा, अन्याय और अपने भीतर के दोषों का अंत। यह किसी व्यक्ति, समुदाय या आस्था के विरोध से नहीं, बल्कि सत्कर्म के प्रकाश से होता है — जैसे अंधकार से लड़ा नहीं जाता, दीपक जलाया जाता है।

राष्ट्र-कल्याण का सात्त्विक भाव: राष्ट्र का अर्थ है उसके सभी नागरिक। साधक का राष्ट्र-कल्याण का संकल्प देश के प्रत्येक व्यक्ति के सुख, स्वास्थ्य, सद्भाव और समृद्धि के लिए होता है — चाहे वह किसी भी जाति, पंथ या आस्था का हो। श्री मलंग गढ़ की वह परंपरा, जहाँ विभिन्न आस्थाओं के श्रद्धालु एक ही दरबार पर आते हैं, इसी सद्भाव का जीवंत उदाहरण है।

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥— श्री दुर्गा सप्तशती ११.३अर्थ — शरणागत के दुःख हरने वाली देवी! प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरी! विश्व की रक्षा करो — तुम ही चराचर जगत की अधीश्वरी हो।

अध्याय ७

साधक का संकल्प — लोक-कल्याण का भाव

हर साधना संकल्प से आरंभ होती है, और संकल्प ही तय करता है कि साधना सत्कर्म बनेगी या विकर्म। साधक अपने गुरु-निर्दिष्ट संकल्प के साथ यह भाव भी जोड़ सकता है:

"मैं अपनी साधना का फल माँ भगवती और गुरु-चरणों में अर्पित करता हूँ।
मेरी साधना से किसी का अहित न हो।
यह मेरे परिवार, समाज, राष्ट्र और समस्त प्राणियों के कल्याण का कारण बने।"

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥— शान्ति-मन्त्रअर्थ — सब सुखी हों, सब निरोगी हों, सब कल्याण देखें, कोई भी दुःख का भागी न हो।

यह छोटा-सा भाव साधना को निजी इच्छा से उठाकर लोक-कल्याण का यज्ञ बना देता है।

उपसंहार

सार — एक दृष्टि में

  • धर्म वह है जो धारण करे — व्यक्ति, परिवार और समाज को जोड़कर रखे; जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों मिलें। शुद्ध तंत्र अपने स्वरूप में धर्म है।
  • सत्कर्म — शास्त्र-विहित कर्तव्य; विकर्म — निषिद्ध कर्म (और विनोबा की दृष्टि में कर्म के साथ जुड़ी आंतरिक साधना); अकर्म — कर्तापन और फल-आसक्ति से मुक्त कर्म।
  • एक ही साधना भाव और उद्देश्य के अनुसार सत्कर्म, विकर्म या अकर्म बनती है।
  • किसी को हानि पहुँचाने, वश में करने या भय का व्यापार करने वाली साधना विकर्म है — वह लौटकर कर्ता का ही नाश करती है।
  • साधना की शक्ति एक धरोहर है — उसका उपयोग स्वयं, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण के लिए सत्कर्म में हो।
  • धर्म-स्थापना आचरण, सेवा और सत्य से होती है — किसी के विरोध से नहीं।

विनम्र निवेदन: यह लेख गीता, महाभारत, वैशेषिक दर्शन और गुरु-परंपरा से प्राप्त समझ को सरल रूप में रखने का प्रयास है। इसका उद्देश्य साधकों और जनसामान्य को यह स्मरण कराना है कि साधना का अंतिम लक्ष्य आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण है। जो कुछ शुभ है वह गुरुजनों का है, और जो त्रुटि हो वह लेखक की।