शास्त्र ज्ञान · लेख
पञ्चकोश और तांत्रिक पूजा
देह से देव तक
शरीर केवल हाड़-मांस नहीं, और आत्मा केवल "सूक्ष्म शरीर" नहीं। उपनिषद् और तंत्र मिलकर बताते हैं कि आत्मा पाँच आवरणों में ढकी है — और तांत्रिक पूजा का हर अंग इन्हीं आवरणों को क्रम से शुद्ध करने की विधि है।
भूमिका
प्रचलित धारणा और शास्त्र की पूरी बात
प्रवचनों में प्रायः सुनने को मिलता है कि मनुष्य के दो शरीर हैं — स्थूल, यानी यह दिखाई देने वाला शरीर, और सूक्ष्म, जिसे कई बार सीधे "आत्मा" कह दिया जाता है। और फिर कहा जाता है कि मृत्यु के बाद यही सूक्ष्म शरीर या आत्मा यात्रा करती है।
सरलता से समझाने के लिए यह बात कही जाती है, और इसमें सत्य का एक अंश भी है। परंतु जब हम मूल ग्रंथों — उपनिषद्, वेदान्त प्रकरण-ग्रंथ और आगम-तंत्र — को देखते हैं, तो चित्र कहीं अधिक सूक्ष्म और पूर्ण दिखाई देता है। शास्त्र कहते हैं:
- शरीर तीन हैं — स्थूल, सूक्ष्म और कारण।
- इन तीन शरीरों में पाँच कोश (आवरण) हैं — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय।
- आत्मा इनमें से कोई नहीं है — वह तीनों शरीरों और पाँचों कोशों का साक्षी है।
- मृत्यु के बाद यात्रा सूक्ष्म शरीर करता है, कारण शरीर के साथ। आत्मा तो सर्वव्यापी है — वह कहीं आती-जाती नहीं।
- तंत्र इससे भी गहरे जाकर बताता है कि आनन्दमय कोश के भी मूल में माया और पाँच कञ्चुक हैं, जिनसे अनन्त शिव-चेतना सीमित जीव बनती है।
यह लेख इन्हीं बातों को क्रम से, शास्त्र-वचनों के साथ, और चित्रों की सहायता से समझाने का एक विनम्र प्रयास है। साथ ही यह दिखाता है कि जो तांत्रिक पूजा हम प्रतिदिन करते हैं — आचमन, प्राणायाम, भूतशुद्धि, न्यास, ध्यान, जप — उसका हर अंग किसी न किसी कोश की शुद्धि के लिए है। यही "देह से देव तक" की यात्रा है।
मृत्यु के बाद "आत्मा" की यात्रा — इस धारणा में कारण शरीर और साक्षी आत्मा का भेद छूट जाता है।
अध्याय १
कोश क्या है?
संस्कृत में कोश का अर्थ है — म्यान, खोल, आवरण या भंडार। जैसे तलवार म्यान में रखी हो तो म्यान ही दिखाई देती है, तलवार नहीं; वैसे ही आत्मा इन पाँच आवरणों में ढकी है, इसलिए हमें आवरण ही "मैं" लगते हैं। कोई कहता है "मैं मोटा हूँ" — यह अन्नमय कोश से तादात्म्य है। कोई कहता है "मैं थका हूँ" — यह प्राणमय से। "मैं दुखी हूँ" — मनोमय से। "मैं विद्वान हूँ" — विज्ञानमय से।
इस सिद्धांत का मूल स्रोत है तैत्तिरीय उपनिषद् (कृष्ण यजुर्वेद) की ब्रह्मानन्दवल्ली। वहाँ एक-एक कोश का वर्णन करके हर बार कहा जाता है — इससे भिन्न, इसके भीतर एक और "आत्मा" है, जिससे यह भरा हुआ है:
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् २.२अर्थ — उस अन्न-रसमय (देह) से भिन्न, उसके भीतर प्राणमय आत्मा है; उसी से यह (देह) भरा हुआ है।
यही वाक्य हर स्तर पर दोहराया जाता है — अन्नमय के भीतर प्राणमय, प्राणमय के भीतर मनोमय, मनोमय के भीतर विज्ञानमय, विज्ञानमय के भीतर आनन्दमय। और अन्त में कहा जाता है — "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा", इन सबका आधार ब्रह्म है।
ध्यान रहे, उपनिषद् यहाँ हर कोश को "आत्मा" कहता है — क्योंकि हर स्तर पर मनुष्य उसी को "मैं" मानता है। यह क्रमशः भीतर ले जाने की विधि है। वेदान्त के आचार्य इसे अरुन्धती-न्याय से समझाते हैं — जैसे सूक्ष्म अरुन्धती तारा दिखाने के लिए पहले पास का बड़ा तारा दिखाया जाता है, फिर उसके पास वाला, फिर असली; वैसे ही स्थूल से आरम्भ कर सूक्ष्मतम तक ले जाया जाता है।
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥— कठोपनिषद् २.३.१७अर्थ — अंतरात्मा सदा मनुष्यों के हृदय में स्थित है। उसे अपने शरीर से वैसे ही धैर्यपूर्वक अलग पहचानना चाहिए जैसे मुञ्ज घास से उसकी भीतरी सींक निकाली जाती है।
अध्याय २
तीन शरीर, तीन अवस्थाएँ और आत्मा
पाँच कोश और तीन शरीर दो अलग सिद्धांत नहीं हैं — एक ही सत्य को देखने के दो ढंग हैं। आदि शंकराचार्य को समर्पित प्रकरण-ग्रंथ तत्त्वबोध में तीनों शरीरों की परिभाषा बहुत स्पष्ट है:
पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतैः कृतं सत्कर्मजन्यं सुखदुःखादिभोगायतनं शरीरम् ।— तत्त्वबोध — स्थूल शरीरअर्थ — पंचीकृत (आपस में मिले हुए) पाँच महाभूतों से बना, पूर्व कर्मों से प्राप्त, सुख-दुःख भोगने का घर — यह स्थूल शरीर है।
सूक्ष्म शरीर को तत्त्वबोध "अपञ्चीकृत" (सूक्ष्म, बिना मिले) महाभूतों से बना और सत्रह कलाओं वाला बताता है — पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि। इसे लिङ्ग शरीर भी कहते हैं, क्योंकि यही जीव की पहचान (लिङ्ग) बनकर जन्म-जन्मान्तर साथ चलता है। ध्यान दें — यहाँ इन्द्रियों से अर्थ आँख-कान जैसे बाहरी अंग नहीं, बल्कि देखने-सुनने की सूक्ष्म शक्ति है।
अनिर्वाच्यानाद्यविद्यारूपं शरीरद्वयस्य कारणमात्रं सत्स्वरूपाज्ञानं निर्विकल्पकरूपं यदस्ति तत्कारणशरीरम् ।— तत्त्वबोध — कारण शरीरअर्थ — जो अवर्णनीय, अनादि अविद्या रूप है, स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों का कारण है, अपने सत्-स्वरूप का अज्ञान है और निर्विकल्प है — वह कारण शरीर है।
और आत्मा के विषय में तत्त्वबोध कहता है:
स्थूलसूक्ष्मकारणशरीराद्व्यतिरिक्तः पञ्चकोशातीतः सन् अवस्थात्रयसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूपः सन् यस्तिष्ठति स आत्मा ।— तत्त्वबोध — आत्माअर्थ — जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों से भिन्न है, पाँचों कोशों से परे है, तीनों अवस्थाओं का साक्षी है और सच्चिदानन्द स्वरूप है — वही आत्मा है।
यहीं प्रचलित धारणा का अधूरापन स्पष्ट होता है। सूक्ष्म शरीर आत्मा नहीं है — वह तो प्राण, मन, बुद्धि और इन्द्रियों का बना एक सूक्ष्म यंत्र है, जिसमें आत्मा का प्रकाश पड़ता है। जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में पड़ता है और जल हिलने पर प्रतिबिम्ब हिलता दिखता है, पर सूर्य नहीं हिलता — वैसे ही मन-बुद्धि की हलचल आत्मा में दिखती है, पर आत्मा अचल है।
तीन अवस्थाएँ और चौथी
माण्डूक्य उपनिषद् तीनों शरीरों को तीन अवस्थाओं से जोड़ता है। जाग्रत में हम स्थूल शरीर से जगत को भोगते हैं (अभिमानी "विश्व"); स्वप्न में स्थूल शरीर निष्क्रिय रहता है, पर सूक्ष्म शरीर अपना जगत रच लेता है (अभिमानी "तैजस"); गहरी नींद में मन-बुद्धि भी लीन हो जाते हैं, केवल अज्ञान से ढका आनन्द रहता है (अभिमानी "प्राज्ञ")। इन तीनों के परे जो चौथा है — तुरीय — वही आत्मा है:
नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् ।
… प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥— माण्डूक्य उपनिषद् ७अर्थ — जो न भीतर की ओर प्रज्ञ है, न बाहर की ओर … जो प्रपंच से रहित, शांत, शिव और अद्वैत है — उसे चौथा (तुरीय) कहते हैं; वही आत्मा है, वही जानने योग्य है।
अध्याय ३
पाँचों कोश — विस्तार से
अब एक-एक कोश को विस्तार से देखें — उसका स्वरूप, घटक, उसकी अशुद्धि के लक्षण, और उसकी शुद्धि की साधना। कोशों के घटक वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र) और विवेकचूडामणि के अनुसार दिए गए हैं।
अन्न से जन्मा, अन्न से पला, और अन्त में अन्न (पृथ्वी) में ही मिल जाने वाला यह देह अन्नमय कोश है। त्वचा, मांस, रक्त, अस्थि, मज्जा — सब इसी के भाग हैं। यह सबसे बाहरी आवरण है, और सबसे अधिक इसी से हमारा "मैं" जुड़ा रहता है।
स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ।
तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् २.१अर्थ — यह पुरुष अन्न-रस से बना है। यह (सिर) ही इसका सिर है, यह (दायाँ हाथ) दायाँ पंख, यह (बायाँ) बायाँ पंख, यह (धड़) आत्मा, और यह (निचला भाग) पूँछ अर्थात् आधार है। — उपनिषद् हर कोश को एक पक्षी के रूप में दिखाता है।
देहोऽयमन्नभवनोऽन्नमयस्तु कोशश्चान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीनः ।
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीषराशिर्नायं स्वयं भवितुमर्हति नित्यशुद्धः ॥— विवेकचूडामणिअर्थ — अन्न से बना यह देह अन्नमय कोश है; अन्न से जीता है, अन्न के बिना नष्ट हो जाता है। त्वचा, मांस, रक्त, अस्थि और मल का यह ढेर नित्य-शुद्ध आत्मा नहीं हो सकता।
तंत्र की विशेष दृष्टि: वेदान्त कहता है "यह देह मैं नहीं" — और तंत्र जोड़ता है, "पर यह देह देवालय है।" कालिदास का वचन है — "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" (कुमारसम्भव ५.३३), शरीर ही धर्म का पहला साधन है। इसलिए तंत्र देह को तुच्छ नहीं मानता, उसे पवित्र करके साधना का यंत्र बनाता है।
देह के भीतर जो शक्ति श्वास लेती है, भोजन पचाती है, रक्त चलाती है और कर्म करवाती है — वह प्राण है। मृत्यु के समय शरीर तो रहता है, पर प्राण चला जाता है — इसी से समझ आता है कि प्राण देह से भिन्न और सूक्ष्म है। भूख-प्यास, थकान-स्फूर्ति, गर्मी-ठंड का अनुभव इसी कोश का है।
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः ।
तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् २.२अर्थ — अन्नमय से भिन्न, उसके भीतर प्राणमय आत्मा है, उसी से यह भरा है। प्राण उसका सिर है, व्यान दायाँ पंख, अपान बायाँ पंख, आकाश (समान) उसका धड़, और पृथ्वी उसका आधार।
प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यते ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् २.३अर्थ — प्राण ही प्राणियों की आयु है, इसलिए उसे "सर्वायुष" कहा जाता है।
तंत्र की विशेष दृष्टि: इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियाँ, षट्चक्र और कुण्डलिनी — तंत्र-योग का अधिकांश क्षेत्र इसी प्राणमय कोश में है। जब मन्त्र-जप और प्राणायाम साथ चलते हैं, तो प्राण सुषुम्ना की ओर उन्मुख होने लगता है। इसीलिए गुरु पहले प्राण को शांत और संतुलित करवाते हैं, फिर गहरी साधना में उतारते हैं।
संकल्प-विकल्प, इच्छा-द्वेष, भय-आशा, सुख-दुःख — ये सब मन की वृत्तियाँ हैं। इन्द्रियाँ जो कुछ लाती हैं, मन उसे ग्रहण कर "अच्छा-बुरा" का रंग चढ़ाता है। स्वप्न में स्थूल शरीर सोया रहता है, पर मन पूरा जगत रच लेता है — यह मनोमय कोश की शक्ति है।
तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः ।
तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् २.३अर्थ — प्राणमय से भिन्न, उसके भीतर मनोमय आत्मा है। यजुः उसका सिर, ऋक् दायाँ पंख, साम बायाँ पंख, आदेश (उपदेश) उसका धड़, और अथर्व-आङ्गिरस उसका आधार। — अर्थात् मन शब्द और मन्त्र से बना है; इसीलिए मन्त्र ही मन का सबसे सीधा उपचार है।
साधक के लिए विशेष सावधानी: साधना में होने वाले अधिकांश दृश्य-अनुभव — प्रकाश, आकृतियाँ, देव-रूप, आवाज़ें — इसी कोश (और प्राणमय) के स्तर पर प्रकट होते हैं। ये अनुभव सच्चे और शुभ हो सकते हैं, पर ये अन्तिम सत्य नहीं हैं। इन्हें नमन करें, गुरु को बताएँ, और आगे बढ़ें — इनमें उलझना या इनका अहंकार करना साधना को यहीं रोक देता है।
मन प्रस्ताव रखता है, बुद्धि निर्णय करती है। "यह करना है, यह नहीं" — यह विवेक विज्ञानमय कोश का कार्य है। यहीं "मैं कर्ता हूँ, मैं ज्ञाता हूँ" का अभिमान रहता है। मन से सूक्ष्म होने के कारण यह मन को दिशा देता है। विद्वानों और साधकों का सूक्ष्म अहंकार भी प्रायः इसी कोश में छिपा रहता है।
तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । तेनैष पूर्णः ।
तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् २.४अर्थ — मनोमय से भिन्न, उसके भीतर विज्ञानमय आत्मा है। श्रद्धा उसका सिर है, ऋत दायाँ पंख, सत्य बायाँ पंख, योग उसका धड़, और महः (महत् तत्त्व) उसका आधार।
विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् २.५अर्थ — विज्ञान (बुद्धि) ही यज्ञ का विस्तार करता है, और सब कर्मों का भी।
ध्यान दें: उपनिषद् विज्ञानमय कोश का सिर "श्रद्धा" बताता है, तर्क नहीं। सही बुद्धि वह है जो श्रद्धा, ऋत (नियम) और सत्य पर टिकी हो। इसीलिए तंत्र में विनियोग पढ़ते समय साधक अपनी बुद्धि को बताता है कि वह किस परंपरा, किस ऋषि और किस उद्देश्य से जुड़ रहा है।
गहरी, स्वप्न-रहित नींद में न देह का भान रहता है, न विचार, न "मैं" का। फिर भी उठकर हम कहते हैं — "बहुत आनन्द से सोया।" वह आनन्द आनन्दमय कोश का है। यह आत्मा के सबसे निकट का आवरण है — इतना पारदर्शी कि आत्मा का आनन्द इसमें से झलकता है। परंतु यह भी अज्ञान से ढका है — नींद टूटते ही वह आनन्द चला जाता है। इसलिए यह भी आत्मा नहीं, आवरण ही है।
तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात् । अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः ।
तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् २.५अर्थ — विज्ञानमय से भिन्न, उसके भीतर आनन्दमय आत्मा है। प्रिय (प्रिय वस्तु को देखने का सुख) उसका सिर, मोद (उसे पाने का सुख) दायाँ पंख, प्रमोद (उसे भोगने का सुख) बायाँ पंख, आनन्द उसका धड़ — और ब्रह्म उसका आधार है।
सबसे महत्वपूर्ण बात: उपनिषद् आनन्दमय कोश पर भी नहीं रुकता — "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा", उसका आधार ब्रह्म है। साधना में जब गहरा आनन्द आए, तब भी साधक को जानना चाहिए कि यह अन्तिम पड़ाव नहीं। जो इस आनन्द को भी देख रहा है — वही आत्मा है।
इन्द्रियाँ दो कोशों में क्यों?
जिज्ञासु पाठक देखेंगे कि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मनोमय और विज्ञानमय दोनों में गिनी गई हैं। इसका कारण यह है कि इन्द्रियाँ अकेले कुछ नहीं करतीं — जब वे मन के साथ होती हैं, तब संशय और भावना उत्पन्न होती है (मनोमय); जब बुद्धि के साथ होती हैं, तब निश्चय उत्पन्न होता है (विज्ञानमय)। "यह कुछ है" — यह मन; "यह रस्सी है, साँप नहीं" — यह बुद्धि।
अध्याय ४
भृगु की यात्रा — अन्न से आनन्द तक
तैत्तिरीय उपनिषद् की तीसरी वल्ली — भृगुवल्ली — इन्हीं कोशों को एक साधना-कथा के रूप में दिखाती है। वरुण के पुत्र भृगु अपने पिता के पास जाकर कहते हैं — "भगवन्, मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए।" वरुण कोई सीधा उत्तर नहीं देते, केवल लक्षण बताते हैं:
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति ।
तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् ३.१अर्थ — जिससे ये सब प्राणी जन्मते हैं, जिससे जीते हैं, और अन्त में जिसमें लौटकर लीन हो जाते हैं — उसे जानने की इच्छा करो, वही ब्रह्म है।
और साथ में एक ही साधन बताते हैं — "तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति" — तप से ब्रह्म को जानो, तप ही ब्रह्म (को जानने का मार्ग) है।
भृगु तप करते हैं और पहले जानते हैं — "अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्" (३.२)। पिता के पास लौटते हैं; पिता फिर कहते हैं, "और तप करो।" फिर भृगु जानते हैं — प्राण ब्रह्म है (३.३); फिर मन (३.४); फिर विज्ञान (३.५); और अन्त में:
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।
आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ॥— तैत्तिरीय उपनिषद् ३.६अर्थ — उन्होंने जाना कि आनन्द ही ब्रह्म है। आनन्द से ही ये सब प्राणी जन्मते हैं, आनन्द से जीते हैं, और आनन्द में ही लौटकर लीन होते हैं।
इस कथा में साधक के लिए तीन बड़ी सीखें हैं:
- गुरु उत्तर नहीं, दिशा देते हैं। वरुण हर बार "और तप करो" कहते हैं — अनुभव शिष्य को स्वयं करना होता है।
- हर पड़ाव सत्य का एक अंश है। भृगु को हर स्तर पर कुछ सच्चा मिला — पर वह पूर्ण नहीं था। साधना में हर अनुभव का सम्मान करें, पर रुकें नहीं।
- यात्रा क्रमिक है। अन्न से आनन्द तक — कोई स्तर छोड़ा नहीं जा सकता। यही क्रम तांत्रिक पूजा में भी है, जैसा आगे देखेंगे।
अध्याय ५
तंत्र की दृष्टि — कोश से भी गहरे
वेदान्त की दृष्टि में कोश अविद्या के आवरण हैं, जिन्हें विवेक से "नेति-नेति" (यह नहीं, यह नहीं) कहकर अलग करना है। तंत्र — विशेषकर काश्मीर शैव दर्शन — इसी सत्य को दूसरी ओर से देखता है। उसके अनुसार ये आवरण किसी बाहरी अज्ञान ने नहीं डाले; स्वयं शिव ने अपनी स्वतन्त्र इच्छा से अपने को सीमित किया है, और वही सीमित शिव जीव है।
चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ॥— प्रत्यभिज्ञाहृदयम् — सूत्र १अर्थ — स्वतन्त्र चिति (चेतना-शक्ति) ही समस्त विश्व की सिद्धि का कारण है।
चिद्वत्तच्छक्तिसङ्कोचात् मलावृतः संसारी ॥— प्रत्यभिज्ञाहृदयम् — सूत्र ९अर्थ — चेतना वही रहते हुए भी, अपनी शक्तियों के संकोच से, मलों से ढका हुआ (शिव) संसारी जीव बन जाता है।
आनन्दमय कोश के भी नीचे — षट्-कञ्चुक
वेदान्त जहाँ आनन्दमय कोश (कारण शरीर) पर आकर उसे "अविद्या" कहता है, वहाँ तंत्र उस अविद्या की संरचना भी बताता है। शिव की पाँच शक्तियाँ — चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया — माया के प्रभाव से पाँच कञ्चुकों (चोलों) में सिमट जाती हैं:
- कला — सर्वकर्तृत्व सिमटकर "थोड़ा कर सकने" की शक्ति बनता है।
- विद्या — सर्वज्ञता सिमटकर "थोड़ा जानने" की शक्ति बनती है।
- राग — पूर्णता सिमटकर "कुछ चाहिए" की कमी बनती है।
- काल — नित्यता सिमटकर "पहले-बाद" का समय बनती है।
- नियति — सर्वव्यापकता सिमटकर "यहीं, इसी से" का बन्धन बनती है।
इन छहों (माया सहित) से ढका शिव पुरुष — यानी सीमित जीव — बनता है। फिर उसके नीचे प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ, तन्मात्राएँ और पंचमहाभूत आते हैं — यही हमारे पाँच कोश हैं। इस प्रकार तंत्र बताता है कि कोश बाहरी परतें हैं और कञ्चुक उनकी जड़। दोनों मार्गों का गन्तव्य एक है — वेदान्त उसे "आत्म-साक्षात्कार" कहता है, तंत्र उसे "प्रत्यभिज्ञा" (अपने शिवत्व की पुनः पहचान)।
तंत्र का मूल सिद्धांत — देह ही देवालय
वेदान्त कोशों से "अलग" होना सिखाता है, तंत्र उन्हें "शुद्ध और दिव्य" बनाना सिखाता है। तंत्र कहता है — कोश बाधा नहीं, सीढ़ी हैं। जिस देह, प्राण और मन से बन्धन होता है, उसी को पवित्र करके मुक्ति का साधन बनाया जा सकता है।
देहो देवालयः प्रोक्तः स जीवः केवलः शिवः ।
त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत् ॥— मैत्रेयी उपनिषद् २.१अर्थ — देह को देवालय कहा गया है और उसमें रहने वाला जीव केवल शिव है। अज्ञान रूपी पुराने निर्माल्य को त्यागकर "सोऽहम्" (वह मैं हूँ) भाव से उसकी पूजा करे।
इसी से तंत्र का प्रसिद्ध सिद्धांत निकलता है — "नादेवो देवमर्चयेत्" — जो स्वयं देवभाव में नहीं, वह देवता की पूजा नहीं कर सकता; और "देवो भूत्वा देवं यजेत्" — देव बनकर देव की पूजा करो। तांत्रिक पूजा का सारा क्रम इसी के लिए है: पहले साधक अपने पाँचों कोशों को शुद्ध कर देवभाव में आता है, फिर पूजा करता है।
दीक्षा — कञ्चुकों पर पहला प्रहार
कोश साधना से शुद्ध होते हैं, पर कञ्चुकों और आणव मल (अपने को अपूर्ण मानने का मूल संस्कार) पर गुरु-कृपा का विशेष स्थान है। तंत्रों में दीक्षा की परिभाषा यही बताती है:
दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयते पशुबन्धनम् ।
दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ॥— तंत्र-वचनअर्थ — जिसमें ज्ञान का सद्भाव दिया जाता है और पशु-बन्धन (जीव के मल-कञ्चुक) क्षीण किए जाते हैं — देने (दान) और क्षय करने (क्षपण) के इस संयोग से इसे "दीक्षा" कहते हैं।
इसीलिए दीक्षा कोई वस्तु नहीं, जिसे बेचा या खरीदा जा सके — वह बन्धन-क्षय की शुरुआत है। यही कारण है कि यहाँ दीक्षा पूर्णतः निःशुल्क दी जाती है।
अध्याय ६
तांत्रिक पूजा का क्रम — हर अंग एक कोश की शुद्धि
अब इस लेख का मुख्य विषय — हम प्रतिदिन जो तांत्रिक पूजा करते हैं, वह पाँचों कोशों को बाहर से भीतर तक क्रम से शुद्ध करने की विधि है। लोग प्रायः पूजा के अंगों को केवल नियम या कर्मकाण्ड समझकर जल्दी-जल्दी पूरा कर लेते हैं। जब उनका भीतरी अर्थ समझ आता है, तो वही पूजा जीवंत साधना बन जाती है।
भूतशुद्धि — तंत्र की अनोखी विधि
भूतशुद्धि को तंत्र में पूजा का अनिवार्य अंग माना गया है। इसमें साधक भावना से अपने जीव-चैतन्य को हृदय से सुषुम्ना मार्ग द्वारा सहस्रार में परम शिव तक ले जाता है। फिर देह के पंचभूतों को एक-एक करके अगले सूक्ष्म भूत में लीन करता है — पृथ्वी जल में, जल अग्नि में, अग्नि वायु में, वायु आकाश में, और आकाश अहंकार-महत्-प्रकृति के क्रम से परम तत्त्व में।
इसके बाद देह में स्थित पाप-संस्कारों का "यं" (वायु बीज) से शोषण, "रं" (अग्नि बीज) से दहन, और "वं" (अमृत बीज) से प्लावन किया जाता है। अन्त में शुद्ध, दिव्य देह की भावना करके जीव को पुनः हृदय में स्थापित किया जाता है।
ध्यान से देखें तो यह पाँचों कोशों का भावनात्मक लय और पुनर्निर्माण है — पुराना, अशुद्ध "मैं" विलीन होता है और देवता की पूजा के योग्य एक नया, पवित्र साधक जन्म लेता है। शिवसूत्र इसी को कहता है — "शरीरे संहारः कलानाम्" (३.४), शरीर में ही तत्त्वों (कलाओं) का संहार (लय) करना।
न्यास — देह को मन्त्रमय बनाना
न्यास का अर्थ है "स्थापित करना"। ऋष्यादि न्यास में मन्त्र के ऋषि को सिर में, छन्द को मुख में, देवता को हृदय में रखा जाता है; कर-न्यास और षडङ्ग-न्यास में मन्त्र-शक्ति हाथों और हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र रूप में स्थापित होती है; मातृका-न्यास में संस्कृत के पचास वर्ण शरीर के अंगों में रखे जाते हैं।
इसका परिणाम यह है कि जो देह अब तक अन्न और भूतों का बना था (अन्नमय), वह भावना में मन्त्रमय और देवमय हो जाता है। प्राण उस मन्त्र-शक्ति के वाहक बनते हैं (प्राणमय) और मन उसका निरन्तर स्मरण करता है (मनोमय)।
मानस पूजा — अपने ही पंचतत्त्व अर्पित करना
मानस पूजा में साधक बाहरी वस्तुओं की जगह अपने भीतर के तत्त्व अर्पित करता है:
लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि । हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि ।
यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि । रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि ।
वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि । सं सर्वात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि ॥— पंचोपचार मानस पूजाअर्थ — पृथ्वी-तत्त्व रूप गन्ध, आकाश-तत्त्व रूप पुष्प, वायु-तत्त्व रूप धूप, अग्नि-तत्त्व रूप दीप, अमृत रूप नैवेद्य और सर्वात्म रूप ताम्बूल अर्पित करता हूँ।
यहाँ साधक वस्तुतः अपने अन्नमय कोश के पाँचों तत्त्व ही देवता को समर्पित कर रहा है। जब तत्त्व समर्पित हो गए, तो "यह मेरा शरीर है" का अभिमान ढीला पड़ता है — यही मानस पूजा का रहस्य है।
जप — वाणी का बाहर से भीतर उतरना
तंत्र में वाणी के चार स्तर माने गए हैं, और ऋग्वेद में भी इसका संकेत मिलता है:
चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥— ऋग्वेद १.१६४.४५अर्थ — वाणी के चार पद (स्तर) हैं, जिन्हें मनीषी ब्राह्मण जानते हैं। इनमें तीन गुहा (भीतर) में छिपे हैं, प्रकट नहीं होते; मनुष्य केवल चौथा (बाहरी) स्तर बोलते हैं।
जप जब वाचिक (बोलकर) से उपांशु (होंठ हिलाकर) और फिर मानसिक होता है, तो वह अन्नमय-प्राणमय से मनोमय-विज्ञानमय की ओर उतरता है। और जब जप करने वाला भी नहीं रहता, केवल मन्त्र का स्पन्दन रहता है — तब साधक परा वाक् के, यानी आत्म-चैतन्य के निकट होता है। यही "मन्त्र-चैतन्य" है।
अध्याय ७
चक्र, नाड़ी और कुण्डलिनी — कोशों में उनका स्थान
लोग प्रायः कोश और चक्र को एक ही मान लेते हैं — "पाँच कोश, सात चक्र" को किसी तरह मिला देते हैं। शास्त्र की दृष्टि से दोनों अलग वर्गीकरण हैं:
- कोश चेतना की परतें हैं — बाहर से भीतर (स्थूल से सूक्ष्म)।
- चक्र प्राण-शरीर में स्थित शक्ति-केन्द्र हैं — नीचे से ऊपर (मूलाधार से सहस्रार)।
नाड़ियाँ, चक्र और कुण्डलिनी मुख्यतः प्राणमय कोश के विषय हैं, यद्यपि उनका प्रभाव मन और बुद्धि तक जाता है। षट्चक्रों के बीज — मूलाधार "लं" (पृथ्वी), स्वाधिष्ठान "वं" (जल), मणिपूर "रं" (अग्नि), अनाहत "यं" (वायु), विशुद्ध "हं" (आकाश), आज्ञा "ॐ" — वही हैं जिनका प्रयोग भूतशुद्धि और मानस पूजा में होता है। इससे स्पष्ट है कि तांत्रिक पूजा और चक्र-साधना एक ही तत्त्व-विज्ञान पर आधारित हैं।
कुण्डलिनी का जागरण प्राणमय कोश में आरम्भ होता है; जैसे-जैसे वह ऊपर उठती है, मन शांत होता है (मनोमय), बुद्धि निर्मल होती है (विज्ञानमय), आनन्द प्रकट होता है (आनन्दमय) — और सहस्रार में शिव-शक्ति का मिलन उस अवस्था का संकेत है जो सब कोशों से परे है।
सावधानी: कुण्डलिनी और चक्र-जागरण के प्रयोग बिना योग्य गुरु के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के न करें। प्राणमय कोश के असंतुलन से शारीरिक और मानसिक कष्ट हो सकता है। सबसे सुरक्षित मार्ग वही है जो तंत्र ने बताया — पहले आहार, दिनचर्या और प्राणायाम से नीचे के कोश स्थिर करें, फिर गुरु-आज्ञा से गहरी साधना में उतरें।
अध्याय ८
मृत्यु के बाद यात्रा किसकी होती है?
अब उस प्रश्न पर आएँ जिससे यह लेख आरम्भ हुआ था — मृत्यु के बाद क्या होता है, और यात्रा कौन करता है?
मृत्यु पर केवल अन्नमय कोश (स्थूल शरीर) छूटता है। प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय — यानी पूरा सूक्ष्म शरीर — कारण शरीर (वासनाओं के बीज) के साथ आगे बढ़ता है। भगवद्गीता इसे सुन्दर उपमा से कहती है:
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥— श्रीमद्भगवद्गीता १५.८अर्थ — जैसे वायु फूलों से गन्ध ले जाती है, वैसे ही देह का स्वामी (जीव) जब एक शरीर छोड़ता है और दूसरा पाता है, तो इन (मन सहित छह इन्द्रियों) को साथ लेकर जाता है।
ठीक इससे पहले का श्लोक (१५.७) बताता है कि जीव "मनःषष्ठानीन्द्रियाणि" — मन और पाँच इन्द्रियों — को खींचता है। यह स्पष्ट रूप से सूक्ष्म शरीर का वर्णन है। बृहदारण्यक उपनिषद् और भी विस्तार से बताता है कि जाते हुए जीव के साथ क्या जाता है:
तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति । प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति ।
… तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥— बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.२अर्थ — उसके निकलते समय प्राण उसके पीछे निकलता है, और प्राण के पीछे सभी इन्द्रियाँ। … उसके साथ उसका ज्ञान, उसके कर्म और पूर्व-संस्कार (पूर्वप्रज्ञा) चलते हैं।
और अगला जन्म कैसा होगा, यह भी वहीं बताया गया है:
यथाकारी यथाचारी तथा भवति । साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति ॥— बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.५अर्थ — जैसा कर्म और जैसा आचरण करता है, वैसा ही बनता है। शुभ कर्म करने वाला शुभ बनता है, पाप करने वाला पापी।
आत्मा यात्रा क्यों नहीं करती?
यात्रा उसकी होती है जो एक स्थान पर हो और दूसरे पर न हो। आत्मा सर्वव्यापक है — गीता कहती है "नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः" (२.२४) — वह नित्य, सर्वत्र व्याप्त, स्थिर और अचल है। जैसे घड़े को एक कमरे से दूसरे कमरे में ले जाएँ तो लगता है घड़े का आकाश भी गया, पर आकाश तो सर्वत्र था — वैसे ही सूक्ष्म शरीर रूपी घड़ा यात्रा करता है, और उसमें आत्मा का प्रकाश साथ-साथ दिखता है; आत्मा स्वयं कहीं नहीं जाती।
और मुक्ति क्या है?
जब ज्ञान से कारण शरीर — यानी मूल अविद्या — नष्ट हो जाता है, तो सूक्ष्म शरीर के आगे जाने का कारण ही नहीं रहता। उपनिषद् कहता है:
… न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति । ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥— बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.६अर्थ — (जो कामना-रहित, आत्मकाम है) उसके प्राण कहीं बाहर नहीं निकलते; वह ब्रह्म होकर ही ब्रह्म में लीन हो जाता है।
इसीलिए अन्तिम समय के भाव का भी इतना महत्व है — "यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥" (गीता ८.६) — मनुष्य जीवन भर जिस भाव में रहता है, वही अन्त में स्मरण होता है, और उसी के अनुसार गति होती है। नित्य जप और साधना इसीलिए है कि सूक्ष्म शरीर पर शुभ संस्कारों की छाप गहरी हो।
अध्याय ९
साधना के अनुभव — किस कोश के हैं?
कोश-ज्ञान का सबसे व्यावहारिक लाभ यह है कि साधक अपने साधना-अनुभवों को सही स्थान पर रख पाता है। अनेक साधक अनुभवों से या तो डर जाते हैं, या उन्हें सिद्धि मानकर अहंकार में फँस जाते हैं। दोनों ही बाधाएँ हैं।
| अनुभव | किस स्तर का |
|---|---|
| शरीर में गर्मी, कंपन, झुनझुनी, ऊर्जा का प्रवाह, नींद-भूख में बदलाव | प्राणमय |
| प्रकाश, रंग, आकृतियाँ, रूप, आवाज़ें, सुगन्ध, जीवंत स्वप्न | मनोमय |
| अचानक स्पष्ट समझ, गहरी अंतर्दृष्टि, निर्णय में दृढ़ता | विज्ञानमय |
| बिना कारण गहरी शांति, आनन्द, विचारों का थम जाना | आनन्दमय |
| इन सब अनुभवों को देखने वाला, जो स्वयं न आता है न जाता है | साक्षी (आत्मा) |
सही दृष्टिकोण: हर अनुभव को कृपा मानकर नमन करें, उसे अपने गुरु को बताएँ, उसका ढिंढोरा न पीटें, और यह स्मरण रखें — जो अनुभव आता है वह जाता भी है; जो उसे देख रहा है, वही आप हैं। तंत्र का शिवसूत्र भी यही कहता है — "दृश्यं शरीरम्" (१.१४), जो कुछ दिखाई देता है वह (मेरा) शरीर है, मैं तो देखने वाला हूँ।
अध्याय १०
कोशों का असंतुलन और भ्रम — रथ, सारथी और सामरस्य
पाँचों कोशों को समझ लेने के बाद एक बहुत व्यावहारिक सत्य सामने आता है — शरीर, प्राण, मन और बुद्धि सचमुच अलग-अलग हैं, और हर एक की अपनी गति, अपनी आदत और अपनी "इच्छा" है। इसीलिए कई बार शरीर की क्रिया, मन में चल रहा विचार और बुद्धि का निर्णय — तीनों एक-दूसरे से भिन्न दिशा में होते हैं। उनका समीकरण नहीं मिलता, और उसी समय मनुष्य भ्रमित हो जाता है।
एक सामान्य उदाहरण लें। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में जप का संकल्प है — बुद्धि जानती है कि उठना चाहिए। शरीर थका है, कहता है "थोड़ा और सो लो।" प्राण सुस्त हैं, श्वास भारी है। और मन पहले से ही कल की किसी बात में उलझा है। चारों अलग दिशा में खिंच रहे हैं — परिणाम: साधक उठ भी जाए, तो जप में मन नहीं लगता; और न उठे, तो दिन भर अपराध-भाव रहता है। यह भ्रम कोई दोष नहीं, कोशों के बीच तालमेल न होने का परिणाम है।
कठोपनिषद् का रथ
इसी स्थिति को कठोपनिषद् में यमराज नचिकेता को एक सुन्दर उपमा से समझाते हैं:
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥— कठोपनिषद् १.३.३–४अर्थ — आत्मा को रथ का स्वामी जानो और शरीर को रथ। बुद्धि को सारथी जानो और मन को लगाम। इन्द्रियों को घोड़े कहा गया है, और विषय (रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श) उनके दौड़ने के मार्ग हैं। शरीर, इन्द्रियों और मन से जुड़े आत्मा को मनीषी "भोक्ता" कहते हैं।
इस चित्र में कोशों का पूरा तालमेल दिखाई देता है। रथ (शरीर) अपने आप कहीं नहीं जाता — उसे घोड़े (इन्द्रियाँ) खींचते हैं; घोड़ों में बल प्राण का है; घोड़े किधर जाएँ, यह लगाम (मन) से तय होता है; लगाम किसके हाथ में है — सारथी (बुद्धि) के; और रथ जाएगा कहाँ — यह स्वामी (आत्मा) का लक्ष्य है। समस्या तब होती है जब सारथी सो जाए, लगाम ढीली हो, और घोड़े विषयों के मार्ग पर मनमाने दौड़ें।
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥
यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥— कठोपनिषद् १.३.५–६अर्थ — जो विवेकहीन है और जिसका मन सदा असंयत रहता है, उसकी इन्द्रियाँ वैसे ही वश में नहीं रहतीं जैसे सारथी के दुष्ट घोड़े। पर जो विवेकवान है और जिसका मन सदा संयत है, उसकी इन्द्रियाँ वैसे ही वश में रहती हैं जैसे सारथी के अच्छे घोड़े।
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥— कठोपनिषद् १.३.९अर्थ — जिसका सारथी विवेक (विज्ञान) है और जिसके हाथ में मन रूपी लगाम दृढ़ है, वह मार्ग के पार पहुँचता है — उस परम पद तक।
ध्यान दें — उपनिषद् घोड़ों को मारने या रथ को तोड़ने की बात नहीं करता। घोड़े ही तो रथ को लक्ष्य तक ले जाएँगे। आवश्यकता केवल यह है कि सब अपने स्थान पर हों और सही क्रम में चलें। यही तंत्र की दृष्टि भी है — इन्द्रियों और शरीर का दमन नहीं, उनका दिव्यीकरण।
भ्रम कैसे जन्म लेता है — गीता की सीढ़ी
भगवद्गीता इन चारों का क्रम बताती है:
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥— श्रीमद्भगवद्गीता ३.४२अर्थ — इन्द्रियों को (शरीर से) श्रेष्ठ कहते हैं, इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, और जो बुद्धि से भी परे है — वह आत्मा है।
स्वस्थ अवस्था में आदेश ऊपर से नीचे आता है — आत्मा का प्रकाश बुद्धि को, बुद्धि मन को, मन इन्द्रियों को, और इन्द्रियाँ शरीर को चलाती हैं। भ्रम तब होता है जब यह क्रम उलट जाता है — इन्द्रियाँ मन को खींचती हैं, और मन बुद्धि को बहा ले जाता है:
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥— श्रीमद्भगवद्गीता २.६७अर्थ — विचरती इन्द्रियों के पीछे जब मन चल पड़ता है, तो वह मन बुद्धि को वैसे ही हर लेता है जैसे जल में वायु नाव को बहा ले जाती है।
और गीता यह भी बताती है कि यह बहाव कितनी सीढ़ियों में भ्रम तक पहुँचता है — विषयों का चिन्तन, उससे आसक्ति, आसक्ति से कामना, कामना में बाधा से क्रोध, और फिर:
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥— श्रीमद्भगवद्गीता २.६३अर्थ — क्रोध से सम्मोह (मूढ़ता) होता है, सम्मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रंश से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य अपने लक्ष्य से गिर जाता है।
यहाँ "स्मृतिविभ्रम" शब्द पर ध्यान दें — भ्रम का अर्थ है अपनी असली पहचान और अपने लक्ष्य की स्मृति का धुँधला हो जाना। सारथी भूल जाता है कि रथ किसका है और कहाँ जाना है।
चार प्रकार के संघर्ष और उनका उपाय
| संघर्ष | कैसा अनुभव होता है | तालमेल का उपाय |
|---|---|---|
| शरीर ↔ बुद्धि | बुद्धि जानती है कि साधना करनी है, शरीर आलस्य या थकान में है | नियमित दिनचर्या, युक्त आहार-निद्रा, थोड़ा आसन; शरीर को दण्ड नहीं, अनुशासन दें |
| प्राण ↔ मन | श्वास अस्थिर, घबराहट; मन स्थिर होना चाहे तो भी नहीं हो पाता | पहले प्राण सँभालें — ५–१० धीमी, लम्बी श्वास; नाड़ी-शोधन |
| मन ↔ बुद्धि | बुद्धि "नहीं" कहती है, मन "हाँ" — इच्छा और विवेक का संघर्ष | जप और स्वाध्याय से मन को ऊँचा विषय दें; गुरु-वचन को बुद्धि का आधार बनाएँ |
| बुद्धि ↔ आत्मा | तर्क बहुत, श्रद्धा कम; "मैं जानता हूँ" का सूक्ष्म अहंकार | समर्पण, सेवा, मौन; बुद्धि को साधन मानें, स्वामी नहीं |
तालमेल की कुंजी — प्राण
मन को सीधे पकड़ना कठिन है — गीता में अर्जुन स्वयं कहते हैं, "चञ्चलं हि मनः कृष्ण" (६.३४)। पर तंत्र-योग एक सरल द्वार बताता है: प्राण। प्राण शरीर और मन के बीच की कड़ी है — रथ के उदाहरण में घोड़ों का बल।
चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत् ॥— हठयोगप्रदीपिका २.२अर्थ — प्राण-वायु चंचल हो तो चित्त चंचल रहता है, प्राण स्थिर हो तो चित्त भी स्थिर हो जाता है। इससे योगी स्थिरता पाता है, इसलिए प्राण का संयम करे।
इसीलिए तांत्रिक पूजा में आचमन और आसन के तुरन्त बाद प्राणायाम आता है। प्राण सधते ही शरीर शांत होता है और मन की लगाम हाथ में आने लगती है — फिर बुद्धि की आवाज़ साफ़ सुनाई देती है।
सामरस्य — जब सब एक रस हो जाएँ
तंत्र में सामरस्य एक अत्यन्त गहरा शब्द है — शिव और शक्ति का एक रस हो जाना। साधक के जीवन में इसका पहला रूप है — शरीर, प्राण, मन और बुद्धि का एक दिशा में आ जाना। जब शरीर स्थिर आसन में हो, प्राण शांत हों, मन मन्त्र में लगा हो और बुद्धि गुरु-वचन पर टिकी हो — तब चारों एक हो जाते हैं। उसी एकता में भ्रम मिटता है और साक्षी की झलक मिलती है। गीता इसी संतुलन को योग कहती है:
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥— श्रीमद्भगवद्गीता ६.१७अर्थ — जिसका आहार-विहार संतुलित है, कर्मों में चेष्टा संतुलित है, सोना-जागना संतुलित है — उसी का योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
ध्यान दें — इस एक श्लोक में सभी कोश आ गए: आहार (अन्नमय), विहार और चेष्टा (प्राणमय), स्वप्न और जागरण (मनोमय-विज्ञानमय)। "युक्त" होना ही सामरस्य है।
भ्रम की घड़ी में क्या करें — चार क्षण का अभ्यास
- रुकें — जब भीतर खींचतान हो, तुरन्त कोई निर्णय न लें। सारथी को जगाने का पहला कदम है रथ को धीमा करना।
- श्वास लें — पाँच धीमी, लम्बी श्वास। प्राण शांत होते ही आधी उलझन स्वयं सुलझ जाती है।
- पहचानें — पूछें: यह इच्छा किसकी है? शरीर की थकान? प्राण की बेचैनी? मन की आदत? या बुद्धि का विवेक? केवल नाम दे देने से उसकी पकड़ ढीली हो जाती है।
- साक्षी बनें — कहें, "शरीर थका है, मैं नहीं; मन चिंतित है, मैं नहीं — मैं इन्हें देख रहा हूँ।" फिर गुरु-वचन और विवेक के अनुसार कदम उठाएँ।
भ्रम का सबसे गहरा कारण असंतुलन नहीं, तादात्म्य है — रथ की टूटी कील को "मैं टूटा हूँ" मान लेना। जब साधक रथी के स्थान पर बैठना सीख जाता है, तो रथ हिचकोले खाए तब भी वह भ्रमित नहीं होता। यही इस पूरी कोश-साधना का फल है।
अध्याय ११
गृहस्थ साधक के लिए दैनिक अभ्यास
गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी पाँचों कोशों की साधना सरल नियमों से की जा सकती है। यह कोई नया अनुष्ठान नहीं — आपकी नित्य पूजा में ही इन्हें जोड़ा जा सकता है:
| कोश | गृहस्थ साधक के लिए सरल दैनिक नियम |
|---|---|
| अन्नमय | सात्त्विक, समय पर, सीमित भोजन; ५–१० मिनट आसन; पर्याप्त नींद; एकादशी या साप्ताहिक उपवास (स्वास्थ्य अनुसार) |
| प्राणमय | १० मिनट नाड़ी-शोधन प्राणायाम; दिन में कुछ समय मौन; श्वास पर ध्यान |
| मनोमय | गुरु-प्रदत्त मन्त्र का नियमित जप; प्रतिदिन कुछ पृष्ठ स्वाध्याय; कुसंग और नकारात्मक सामग्री से दूरी |
| विज्ञानमय | रात्रि में दिन का आत्म-निरीक्षण; "मैं कौन हूँ?" पर मनन; निष्काम भाव से कर्तव्य |
| आनन्दमय | जप के बाद ५–१० मिनट केवल मौन बैठना; हर कर्म का फल गुरु-चरणों में समर्पित करना |
सोने से पहले — पाँच प्रश्नों का आत्म-निरीक्षण
- अन्नमय: आज मैंने शरीर को क्या खिलाया — और कितना?
- प्राणमय: आज कितनी बार मेरी श्वास क्रोध या चिंता में तेज हुई?
- मनोमय: आज मन किस बात पर सबसे अधिक अटका रहा?
- विज्ञानमय: आज मैंने कौन-सा निर्णय अहंकार से लिया, और कौन-सा विवेक से?
- आनन्दमय: आज कब मुझे बिना किसी कारण शांति मिली?
यह अभ्यास धीरे-धीरे साक्षी-भाव जगाता है — आप देखने लगते हैं कि शरीर, प्राण, मन और बुद्धि अपना-अपना काम कर रहे हैं, और आप इन सबको जानने वाले हैं।
उपसंहार
सार — एक दृष्टि में
- मनुष्य के तीन शरीर हैं — स्थूल, सूक्ष्म और कारण; और इनमें पाँच कोश हैं।
- सूक्ष्म शरीर आत्मा नहीं है — वह प्राण, मन, बुद्धि और इन्द्रियों का बना आवरण है। आत्मा तीनों शरीरों और पाँचों कोशों की साक्षी है।
- मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर संस्कारों के साथ यात्रा करता है; आत्मा सर्वव्यापक है, वह आती-जाती नहीं।
- तंत्र बताता है कि कोशों के मूल में माया और पाँच कञ्चुक हैं — शिव का स्व-संकोच। दीक्षा और साधना उस संकोच को खोलती हैं।
- तांत्रिक पूजा का हर अंग — आचमन, प्राणायाम, भूतशुद्धि, न्यास, ध्यान, मानस पूजा, जप, समर्पण — क्रम से एक-एक कोश की शुद्धि है।
- साधना के अनुभव किसी न किसी कोश के स्तर पर होते हैं; उन्हें पहचानें, नमन करें और आगे बढ़ें।
- शरीर, प्राण, मन और बुद्धि अलग-अलग हैं — इनका तालमेल टूटे तो भ्रम होता है। कठोपनिषद् के रथ की तरह बुद्धि सारथी हो, मन लगाम हो, और प्राण सधे हों — यही सामरस्य है।
देवो भूत्वा देवं यजेत् ।— तंत्र-सिद्धांतदेह को देवालय बनाकर, अपने भीतर के देव को पहचानना — यही "देह से देव तक" की यात्रा है।
सन्दर्भ ग्रंथ
- तैत्तिरीय उपनिषद् — ब्रह्मानन्दवल्ली एवं भृगुवल्ली
- कठोपनिषद् — १.३ (रथ-उपमा)
- माण्डूक्य उपनिषद्
- बृहदारण्यक उपनिषद् — अध्याय ४
- मैत्रेयी उपनिषद्
- श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २, ३, ६, ८, १५
- हठयोगप्रदीपिका
- ऋग्वेद १.१६४.४५
- तत्त्वबोध (आदि शंकराचार्य को समर्पित)
- विवेकचूडामणि
- वेदान्तसार — सदानन्द योगीन्द्र
- पञ्चदशी — विद्यारण्य स्वामी (पञ्चकोशविवेक प्रकरण)
- शिवसूत्र — वसुगुप्त
- प्रत्यभिज्ञाहृदयम् — क्षेमराज
- तन्त्रालोक एवं तन्त्रसार — अभिनवगुप्त
विनम्र निवेदन: यह लेख शास्त्रों के अध्ययन और गुरु-परंपरा से प्राप्त समझ को सरल भाषा में रखने का एक प्रयास है — इसमें जो कुछ शुभ है वह गुरुजनों और शास्त्रों का है, और जो त्रुटि हो वह लेखक की है। विद्वान पाठकों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं। भूतशुद्धि, न्यास, कुण्डलिनी आदि की विधियाँ यहाँ केवल समझ के लिए बताई गई हैं; इनका अभ्यास योग्य गुरु की दीक्षा और प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ही करें।
