साधक के लिए · दैनिक

तंत्र पंचांग

तिथि, नक्षत्र, चौघड़िया, होरा, अग्निवास, शिववास और महाविद्या जयंतियाँ — एक ही स्थान पर

हवन, अनुष्ठान, जप-आरंभ और रुद्राभिषेक के लिए साधक को केवल तिथि नहीं, अग्निवास और शिववास जैसे विशेष विचार भी चाहिए। यह पंचांग भारत के किसी भी राज्य या विश्व के किसी भी शहर के लिए, किसी भी दिन, ये सब स्वयं गणना करके दिखाता है।

पंचांग की गणना हो रही है…

स्थान: मुंबई · स्थानीय समय · अमान्त मास · लाहिड़ी अयनांश · सूर्योदय-कालीन तिथि

दैनिक शुभ समय

संध्या, चौघड़िया और होरा

स्थान: मुंबई · ऊपर के कार्ड में तिथि या स्थान बदलने पर यह सूची भी बदल जाती है

संध्या, ब्रह्म मुहूर्त और निशीथ काल

दिन का चौघड़िया (सूर्योदय से सूर्यास्त)

रात्रि का चौघड़िया (सूर्यास्त से अगले सूर्योदय)

चौघड़िया में दिन (सूर्योदय से सूर्यास्त) और रात्रि (सूर्यास्त से अगले सूर्योदय) को आठ-आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है। हर भाग का नाम और फल वार के अनुसार बदलता है:

चौघड़ियाफलकिस कार्य के लिए
अमृतशुभसर्वश्रेष्ठ — पूजा, जप-आरंभ, हर शुभ कार्य
शुभशुभमांगलिक व धार्मिक कार्य, गृह-प्रवेश, संस्कार
लाभशुभव्यापार, अध्ययन, नया काम आरंभ करना
चरसामान्ययात्रा और चलने-फिरने वाले कार्य
उद्वेग, रोग, कालअशुभनया शुभ कार्य इस समय टालें

होरा दिन और रात के बारह-बारह भाग हैं (कुल 24)। हर होरा एक ग्रह की मानी जाती है — पहली होरा उसी ग्रह की होती है जिसका वार है (रविवार की पहली होरा सूर्य की, सोमवार की चंद्र की)। साधक के लिए गुरु की होरा पूजा, जप और दीक्षा के लिए, और चंद्र की होरा यात्रा के लिए अनुकूल मानी जाती है।

चौघड़िया और होरा रोज़मर्रा के कार्यों (यात्रा, ख़रीदारी, नया काम) के लिए लोक-प्रचलित सरल विधि है। विवाह, गृह-प्रवेश, दीक्षा या बड़े अनुष्ठान का मुहूर्त पूर्ण पंचांग-विचार से अपने गुरु या आचार्य से निकलवाएँ। सबसे बड़ा मुहूर्त शुद्ध मन और दृढ़ संकल्प है।

संध्या के समय पारंपरिक अनुमान से: प्रातः संध्या — सूर्योदय से ४८ मिनट पहले से सूर्योदय तक; मध्याह्न संध्या — दिन के मध्य से २४ मिनट आगे-पीछे; सायं संध्या — सूर्यास्त से ४८ मिनट तक। ब्रह्म मुहूर्त — रात्रि का चौदहवाँ मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग ९६ से ४८ मिनट पहले)। अपनी गुरु-परंपरा के नियम को प्राथमिकता दें।

अभी

आज का गोचर

आकाश में ग्रह इस समय किस राशि और नक्षत्र में हैं, और कौन-सा ग्रह कब राशि बदलेगा — यह सूची हर दस मिनट में स्वयं अद्यतन होती है।

गणना हो रही है…

साधक के लिए चंद्रमा का गोचर सबसे अधिक उपयोगी है — मन का कारक होने से चंद्रमा की राशि और नक्षत्र जप-ध्यान के अनुभव पर प्रभाव डालते हैं। गोचर देखकर भयभीत होने की आवश्यकता नहीं; ग्रह-स्थिति जानकारी है, भाग्य का बंधन नहीं।

खगोलीय पर्व

आगामी ग्रहण

अगले तीन वर्षों के चंद्र और सूर्य ग्रहण — मुंबई के अनुसार: स्पर्श, मध्य और मोक्ष का समय, ग्रहण यहाँ से दिखेगा या नहीं, और सूतक कब से लगेगा।

गणना हो रही है…

  • साधना का विशेष समय: ग्रहण-काल में किया गया जप, ध्यान और मंत्र-पुरश्चरण अनेक गुना फलदायी माना गया है। स्पर्श से मोक्ष तक इष्ट-मंत्र का जप करें, मोक्ष के बाद स्नान और दान।
  • सूतक: चंद्र ग्रहण में स्पर्श से ९ घंटे और सूर्य ग्रहण में १२ घंटे पहले आरंभ होता है — केवल वहाँ, जहाँ ग्रहण दिखाई देता है। बालक, वृद्ध, रोगी और गर्भवती महिलाओं के लिए भोजन आदि के नियमों में शास्त्र स्वयं छूट देते हैं।
  • उपच्छाया (मांद्य) ग्रहण धार्मिक रूप से मान्य नहीं होते, इसलिए सूची में नहीं दिखाए गए।
  • सावधानी: सूर्य ग्रहण को कभी भी नंगी आँखों, धूप के चश्मे या कैमरे से सीधे न देखें — आँखों को स्थायी हानि हो सकती है। प्रमाणित सौर-चश्मे का ही उपयोग करें।

वर्ष भर

आगामी तांत्रिक तिथियाँ

अगले बारह महीनों की प्रमुख तांत्रिक तिथियाँ — मुंबई के सूर्योदय और स्थानीय समय के अनुसार (ऊपर स्थान बदलकर अपने शहर की तिथियाँ देखें)। श्रेणी चुनकर सूची छाँट सकते हैं:

तिथियों की गणना हो रही है…

📅 ये तिथियाँ अपने फ़ोन के कैलेंडर में जोड़ें

चुनी हुई तिथियाँ एक बार में आपके फ़ोन या कंप्यूटर के कैलेंडर में जुड़ जाएँगी — और कैलेंडर स्वयं आपको समय पर याद दिलाएगा। तिथियाँ ऊपर चुने गए शहर के अनुसार होंगी।

समझ

वैदिक पंचांग और तंत्र पंचांग

दोनों पंचांगों का खगोलीय आधार एक ही है — सूर्य और चंद्रमा की गति से बने पाँच अंग: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। अंतर इस बात में है कि कौन-सी तिथियाँ और कौन-से विचार प्रमुख रखे जाते हैं:

वैदिक (स्मार्त) पंचांगतंत्र पंचांग
उद्देश्यसंस्कार, व्रत-उत्सव, विवाह-गृहप्रवेश के मुहूर्तसाधना, दीक्षा, अनुष्ठान, पुरश्चरण
प्रमुख पर्वएकादशी, संक्रांति, श्राद्ध, सामान्य व्रतदोनों गुप्त नवरात्रि (माघ व आषाढ़), महाविद्या जयंतियाँ, कालाष्टमी, मासिक शिवरात्रि, अमावस्या, भैरव अष्टमी
विशेष विचारराहुकाल, भद्रा, शुभ लग्नअग्निवास (हवन), शिववास (रुद्राभिषेक), निशीथ काल, सिद्ध योग (रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य)

तंत्र में निशीथ काल (मध्यरात्रि का लगभग 48 मिनट का समय) विशेष माना जाता है — काली पूजा, महाशिवरात्रि और कालाष्टमी जैसे पर्व उसी दिन मनाए जाते हैं जिस रात्रि निशीथ काल में संबंधित तिथि व्याप्त हो।

हवन के लिए

अग्निवास — गणना की विधि

हवन से पहले यह देखा जाता है कि उस दिन अग्नि का वास कहाँ है। शास्त्रीय सूत्र:

सैका तिथिर्वारयुता कृताप्ता शेषे गुणेऽभ्रे भुवि वह्निवासः ।
सौख्याय होमे शशियुग्मशेषे प्राणार्थनाशौ दिवि भूतले च ॥— मुहूर्त-ग्रंथों का प्रचलित वचन

तिथि-संख्या लें — शुक्ल प्रतिपदा से गिनती: शुक्ल पक्ष में 1–15, कृष्ण पक्ष में गिनती आगे 16–30।
उसमें 1 जोड़ें।
उसमें वार-संख्या जोड़ें — रविवार = 1, सोमवार = 2 … शनिवार = 7।
योग को 4 से भाग दें और शेष देखें।
शेषअग्निवासफल
0 या 3पृथ्वीहवन शुभ — सुख-दायक
1आकाशहवन वर्जित — प्राण-कष्ट का भय
2पातालहवन वर्जित — धन-हानि का भय

उदाहरण: शुक्ल पंचमी, बुधवार → 5 + 1 + 4 = 10 → 10 ÷ 4 का शेष 2 → अग्नि पाताल में, उस दिन हवन वर्जित।

परंपरा में नित्य होम, ग्रहण-काल के होम, संस्कारों के होम तथा नवरात्रि जैसे पर्व-अनुष्ठानों में अग्निवास प्रायः नहीं देखा जाता। विभिन्न गुरु-परंपराओं के नियमों में अंतर हो सकता है — अंतिम निर्णय अपने गुरु के निर्देश से करें।

रुद्राभिषेक के लिए

शिववास

रुद्राभिषेक और शिव-अनुष्ठान से पहले शिववास देखा जाता है:

तिथिं च द्विगुणी कृत्वा पुनः पञ्च समन्वितम् ।
सप्तभिस्तु हरेद्भागं शेषं शिववास उच्यते ॥— शिववास का प्रचलित वचन

तिथि-संख्या (1–30) को दो से गुणा करें, उसमें 5 जोड़ें, और 7 से भाग दें। शेष के अनुसार:

शेषशिववासफल
1कैलाशशुभ — सुख
2गौरी-सान्निध्यशुभ — सुख-सम्पदा
3वृषभारूढ़शुभ — अभीष्ट सिद्धि
4सभाअशुभ — संताप
5भोजनअशुभ — पीड़ा
6क्रीड़ाअशुभ — कष्ट
0श्मशानअशुभ — कष्ट

महाशिवरात्रि, श्रावण मास और प्रदोष जैसे विशेष पर्वों पर शिववास प्रायः नहीं देखा जाता।

दस महाविद्या

महाविद्या जयंतियाँ

दस महाविद्याओं की जयंतियों की प्रचलित तिथियाँ (कृष्ण पक्ष के मास पूर्णिमान्त गणना में; महाराष्ट्र की अमान्त गणना में दीपावली आश्विन अमावस्या कहलाती है):

महाविद्याप्रचलित तिथि
माँ कालीकार्तिक अमावस्या (दीपावली की रात्रि — निशीथ काल)
माँ ताराचैत्र शुक्ल नवमी
माँ त्रिपुर सुंदरी (षोडशी)माघ पूर्णिमा
माँ भुवनेश्वरीभाद्रपद शुक्ल द्वादशी
माँ त्रिपुर भैरवीमार्गशीर्ष पूर्णिमा
माँ छिन्नमस्तावैशाख शुक्ल चतुर्दशी
माँ धूमावतीज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी
माँ बगलामुखीवैशाख शुक्ल अष्टमी
माँ मातंगीवैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया)
माँ कमलाकार्तिक अमावस्या (दीपावली — प्रदोष काल)

कुछ परंपराओं में कुछ जयंतियाँ भिन्न तिथियों पर भी मनाई जाती हैं। ऊपर "आगामी तांत्रिक तिथियाँ" में इन्हीं तिथियों की आने वाली अंग्रेज़ी तारीखें स्वयं गणना करके दिखाई गई हैं। (देखें — दस महाविद्या साधना)

पारदर्शिता

गणना की विधि

  • स्थान: भारत के सभी राज्यों की राजधानियाँ, प्रमुख तीर्थ (कामाख्या, तारापीठ, काशी, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर आदि), नेपाल और विदेश के प्रमुख शहर — या आपके फ़ोन का वर्तमान स्थान। सूर्योदय, सूर्यास्त, निशीथ काल और सभी समय उसी स्थान के स्थानीय समय में। विदेश में कभी-कभी पर्व भारत से एक दिन आगे-पीछे पड़ता है — यह स्वाभाविक है।
  • तिथि: सूर्योदय के समय की तिथि (उदया तिथि)। निशीथ-व्यापिनी पर्व (काली पूजा, महाशिवरात्रि, कालाष्टमी, काल भैरव जयंती) मध्यरात्रि की तिथि से, और दीपावली-लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल की तिथि से।
  • मास: अमान्त (महाराष्ट्र की परंपरा) — अमावस्या से अमावस्या तक; अधिक मास में पर्व नहीं गिने जाते।
  • नक्षत्र व योग: निरयन (लाहिड़ी अयनांश)।
  • खगोलीय गणना: सूर्य-चंद्र की स्थिति खुले स्रोत (open-source) खगोल-गणित से, सीधे आपके ब्राउज़र में।

विनम्र निवेदन: यह पंचांग साधकों की सुविधा के लिए है। प्रमुख तिथियाँ स्थापित पंचांगों से मिलाकर जाँची गई हैं, फिर भी किसी बड़े अनुष्ठान, दीक्षा या पुरश्चरण से पहले अपने गुरु और स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।