जनसामान्य और साधक के लिए

व्रत-त्योहार कैलेंडर

एकादशी, प्रदोष, संकष्टी चतुर्थी, पूर्णिमा-अमावस्या, संक्रांति और प्रमुख त्योहार — आपके शहर के अनुसार

"एकादशी कब है?", "संकष्टी पर चंद्रोदय कितने बजे?", "प्रदोष किस दिन?" — ये प्रश्न हर घर में पूछे जाते हैं। यह कैलेंडर भारत के किसी भी राज्य या विदेश के किसी भी शहर के सूर्योदय-चंद्रोदय से अगले बारह महीनों के व्रत-त्योहार स्वयं गणना करके दिखाता है — एकादशी का पारण समय और संकष्टी का चंद्रोदय भी।

गणना हो रही है…

स्थान: मुंबई · सभी समय स्थानीय · अमान्त मास

वर्ष भर

आगामी व्रत और त्योहार

अगले बारह महीनों के व्रत और त्योहार — मुंबई के सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के अनुसार। ऊपर स्थान बदलकर अपने शहर की तिथियाँ देखें; श्रेणी चुनकर सूची छाँट सकते हैं:

तिथियों की गणना हो रही है…

स्मरण

अपने कैलेंडर में जोड़ें

चुने हुए व्रत-त्योहार एक बार में आपके फ़ोन या कंप्यूटर के कैलेंडर में जुड़ जाएँगे — फिर कैलेंडर स्वयं आपको एक दिन पहले याद दिलाएगा, वेबसाइट खोलने की भी आवश्यकता नहीं। तिथियाँ ऊपर चुने गए शहर (मुंबई) के अनुसार होंगी।

उपासना

कौन-सा व्रत किसका

हर व्रत किसी एक देव-स्वरूप की उपासना से जुड़ा है। अपनी श्रद्धा और गुरु के निर्देश के अनुसार कोई एक-दो व्रत नियम से करना, अनेक व्रत अनियमित रूप से करने से अधिक फलदायी है:

व्रतउपास्यकबसरल विधि
एकादशीश्री विष्णुहर पक्ष की ग्यारहवीं तिथिअन्न (विशेषकर चावल) का त्याग, विष्णु-नाम जप; अगले दिन पारण समय में व्रत खोलें
प्रदोषभगवान शिवत्रयोदशी — सूर्यास्त के बाद का प्रदोष कालसंध्या में शिव-पूजा, "ॐ नमः शिवाय" जप; सोम, भौम और शनि प्रदोष विशेष
संकष्टी चतुर्थीश्री गणेशकृष्ण पक्ष की चतुर्थीदिन भर व्रत, रात्रि में चंद्र-दर्शन और अर्घ्य के बाद भोजन; मंगलवार को अंगारकी
विनायक चतुर्थीश्री गणेशशुक्ल पक्ष की चतुर्थीमध्याह्न में गणेश-पूजा, दूर्वा अर्पण
मासिक दुर्गाष्टमीमाँ दुर्गाशुक्ल पक्ष की अष्टमीदेवी-पूजा, दुर्गा सप्तशती या कवच का पाठ
मासिक शिवरात्रिभगवान शिवकृष्ण चतुर्दशी — निशीथ कालरात्रि में शिव-आराधना, जप और ध्यान
पूर्णिमाश्री सत्यनारायण / चंद्रशुक्ल पक्ष की पंद्रहवीं तिथिसत्यनारायण कथा, चंद्र को अर्घ्य, दान
अमावस्यापितृगणकृष्ण पक्ष की अंतिम तिथिपितृ-तर्पण, दीप-दान, अन्न-दान; साधकों के लिए जप-ध्यान का उत्तम दिन
संक्रांतिसूर्यसूर्य का नई राशि में प्रवेशस्नान, सूर्य को अर्घ्य, दान

तंत्र-साधना से जुड़ी तिथियाँ — महाविद्या जयंतियाँ, गुप्त नवरात्रि, कालाष्टमी, अग्निवास और शिववास — तंत्र पंचांग पर अलग से दी गई हैं।

सरल मार्गदर्शन

व्रत के सरल नियम

  • संकल्प: व्रत के दिन प्रातः स्नान के बाद, हाथ में जल लेकर मन में व्रत का संकल्प लें — "आज मैं श्रद्धापूर्वक यह व्रत करूँगा/करूँगी।"
  • सात्त्विक आहार: व्रत का अर्थ भूखा रहना नहीं, संयम है। फलाहार, दूध, साबूदाना, मूँगफली, सेंधा नमक — जितना शरीर सहज सह सके।
  • मन का व्रत: क्रोध, निंदा, झूठ और व्यर्थ बातों से बचना भोजन-त्याग से भी बड़ा व्रत है। दिन में कुछ समय जप या पाठ अवश्य करें।
  • पारण: एकादशी का व्रत अगले दिन (द्वादशी में) पारण समय के भीतर खोलें — यह समय सूची में हर एकादशी के साथ दिया गया है। संकष्टी का व्रत चंद्र-दर्शन के बाद खोला जाता है।
  • स्वास्थ्य पहले: बालक, वृद्ध, गर्भवती महिलाएँ, मधुमेह या अन्य रोग से पीड़ित व्यक्ति निर्जल या कठोर उपवास न करें — फलाहार या केवल एक समय भोजन से भी व्रत पूर्ण होता है। आवश्यक हो तो अपने चिकित्सक से परामर्श लें।
  • नियमितता: वर्ष में एक बार बड़ा व्रत करने से अधिक, हर महीने एक छोटा व्रत नियम से निभाना साधना को दृढ़ करता है।

पारदर्शिता

गणना की विधि

  • स्थान: सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय आपके चुने हुए शहर के अनुसार, स्थानीय समय में। इसलिए दो शहरों में कभी-कभी व्रत एक दिन आगे-पीछे पड़ सकता है — यह स्वाभाविक है।
  • एकादशी: सूर्योदय के समय की तिथि (स्मार्त परंपरा)। पारण: अगले दिन सूर्योदय के बाद, हरिवासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) बीतने पर, प्रातःकाल में। वैष्णव (इस्कॉन) परंपरा में कभी-कभी एकादशी एक दिन बाद होती है।
  • प्रदोष: जिस दिन सूर्यास्त के बाद के प्रदोष काल (लगभग 2 घंटे 24 मिनट) में त्रयोदशी अधिक समय रहे।
  • संकष्टी चतुर्थी व करवा चौथ: जिस दिन चंद्रोदय के समय कृष्ण चतुर्थी हो।
  • अन्य: गणेश चतुर्थी व राम नवमी मध्याह्न-व्यापिनी, जन्माष्टमी (स्मार्त) व शिवरात्रि निशीथ-व्यापिनी, दीपावली व धनतेरस प्रदोष-व्यापिनी, दशहरा व भाई दूज अपराह्न-व्यापिनी तिथि से; शेष उदया तिथि से। मास अमान्त (महाराष्ट्र की परंपरा)।
  • जाँच: 2027 की सभी एकादशी, प्रदोष और संकष्टी तिथियाँ तथा प्रमुख त्योहार प्रकाशित पंचांगों से मिलाकर जाँचे गए हैं।

विनम्र निवेदन: स्थानीय परंपराओं में कुछ त्योहार भिन्न दिन भी मनाए जाते हैं। अपने परिवार और क्षेत्र की परंपरा तथा अपने गुरु के निर्देश को प्राथमिकता दें।